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श्रोता चार्थस्य विदुरस्त्वं च वक्ता जनार्दन।
कमिवार्थं निवर्तन्तं स्थापयेतां न वर्त्मनि॥ १८॥
अनुवाद
जनार्दन! जहाँ विदुरजी किसी योजना को सुनते हैं और आप उसे समझाते हैं, वहाँ आप दोनों मिलकर किसी बिगड़ते हुए कार्य को सफलता के मार्ग पर नहीं लाएँगे?॥18॥
Janardan! Where Vidurji hears of a plan and you explain it, then together you will not bring a deteriorating task on the path of success?॥ 18॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि नकुलवाक्ये अशीतितमोऽध्याय:॥ ८०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें नकुलवाक्यविषयक असीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८०॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥