श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 8: शल्यका दुर्योधनके सत्कारसे प्रसन्न हो उसे वर देना और युधिष्ठिरसे मिलकर उन्हें आश्वासन देना  »  श्लोक 50-52
 
 
श्लोक  5.8.50-52 
यच्च दु:खं त्वया प्राप्तं द्यूते वै कृष्णया सह।
परुषाणि च वाक्यानि सूतपुत्रकृतानि वै॥ ५०॥
जटासुरात् परिक्लेश: कीचकाच्च महाद्युते।
द्रौपद्याधिगतं सर्वं दमयन्त्या यथाशुभम्॥ ५१॥
सर्वं दु:खमिदं वीर सुखोदर्कं भविष्यति।
नात्र मन्युस्त्वया कार्यो विधिर्हि बलवत्तर:॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
हे पराक्रमी युधिष्ठिर! द्यूतशाला में द्रौपदी के साथ जो कष्ट आपने सहे हैं, महारथी कर्ण ने आपसे जो कटु वचन कहे हैं, पूर्वकाल में दमयन्ती को जो विपत्तियाँ सहनी पड़ी थीं, उसी प्रकार जटासुर और कीचक से द्रौपदी को जो महान कष्ट सहने पड़े हैं, वे सब कष्ट भविष्य में आपके लिए सुख में बदल जाएँगे। आपको इस बात का शोक नहीं करना चाहिए; क्योंकि विधाता का विधान बड़ा प्रबल है। ॥50-52॥
 
O mighty and valiant Yudhishthira! The sufferings you have endured with Draupadi in the gambling hall, the harsh words that the son of a charioteer Karna has spoken to you, the misfortunes Damayanti had to endure in the past, in the same way the great sufferings that Draupadi has to endure from Jatasura and Keechak, all these sufferings will turn into happiness for you in the future. You should not be sad about this; because the law of the Creator is very powerful. ॥ 50-52॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)