शल्य उवाच
शृणु पाण्डव ते भद्रं यद् ब्रवीषि महात्मन:।
तेजोवधनिमित्तं मां सूतपुत्रस्य सङ्गमे॥ ४५॥
अहं तस्य भविष्यामि संग्रामे सारथिर्ध्रुवम्।
वासुदेवेन हि समं नित्यं मां स हि मन्यते॥ ४६॥
अनुवाद
शल्य बोले- पाण्डुपुत्र! तुम्हारा कल्याण हो। मेरी बात सुनो! युद्ध में महामनस्वी सारथि कर्ण के तेज और उत्साह को नष्ट करने के लिए तुम मुझसे जो प्रार्थना कर रहे हो, वह सत्य है। यह निश्चित है कि मैं उस युद्ध में उसका सारथि बनूँगा। स्वयं कर्ण भी सारथि के कार्य में मुझे सदैव भगवान श्रीकृष्ण के समान मानता है ॥ 45-46॥
Shalya said— Son of Pandu! May you be blessed. Listen to me! What you are requesting me to do to destroy the brilliance and enthusiasm of the great-minded charioteer Karna in the war is correct. It is certain that I will be his charioteer in that war. Karna himself always considers me equal to Lord Krishna in the work of a charioteer. ॥ 45-46॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥