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mahabharat 5.8.31: 'भारत! तुमने भयंकर वनवास में रहकर और भी कठिन कार्य कर लिया है। जो राज्य से वंचित हो गया है, उसे दुःख ही भोगना पड़ता है, उसे सुख कैसे मिलेगा?॥31॥   |   mahabharat अध्याय 5.8: शल्यका दुर्योधनके सत्कारसे प्रसन्न हो उसे वर देना और युधिष्ठिरसे मिलकर उन्हें आश्वासन देना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 8: शल्यका दुर्योधनके सत्कारसे प्रसन्न हो उसे वर देना और युधिष्ठिरसे मिलकर उन्हें आश्वासन देना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  5.8.31 
अज्ञातवासं घोरं च वसता दुष्करं कृतम्।
दु:खमेव कुत: सौख्यं भ्रष्टराज्यस्य भारत॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
'भारत! तुमने भयंकर वनवास में रहकर और भी कठिन कार्य कर लिया है। जो राज्य से वंचित हो गया है, उसे दुःख ही भोगना पड़ता है, उसे सुख कैसे मिलेगा?॥31॥
 
‘Bharat! By living in the dreadful exile you have accomplished an even more difficult task. One who has been deprived of his kingdom has to suffer pain only, how can he find happiness?॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)