न चापि प्रणिपातेन त्यक्तुमिच्छति धर्मराट्।
याच्यमानश्च राज्यं स न प्रदास्यति दुर्मति:॥ ९॥
अनुवाद
धर्मराज युधिष्ठिर भी शांति के लिए विनम्रतापूर्वक अपना राज्य त्यागना नहीं चाहते, परन्तु दुष्टबुद्धि दुर्योधन माँगने पर भी अपना राज्य नहीं देता॥9॥
Even Dharmaraja Yudhishthira humbly does not want to give up his kingdom for the sake of peace. On the other hand, the evil-minded Duryodhan will not give away his kingdom even if asked for.॥ 9॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥