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mahabharat 5.75.9: पाण्डुनन्दन! इस भीड़ में आपको कभी प्रसन्नता नहीं होती थी; आप सदैव एकान्त में बैठकर ध्यान करते रहते थे। दिन हो या रात, आप कभी किसी को नमस्कार नहीं करते थे। 9॥   |   mahabharat अध्याय 5.75: श्रीकृष्णका भीमसेनको उत्तेजित करना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 75: श्रीकृष्णका भीमसेनको उत्तेजित करना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  5.75.9 
नास्मिञ्जनेऽभिरमसे रह: क्षिपसि पाण्डव।
नान्यं निशि दिवा चापि कदाचिदभिनन्दसि॥ ९॥
 
 
अनुवाद
पाण्डुनन्दन! इस भीड़ में आपको कभी प्रसन्नता नहीं होती थी; आप सदैव एकान्त में बैठकर ध्यान करते रहते थे। दिन हो या रात, आप कभी किसी को नमस्कार नहीं करते थे। 9॥
 
Pandunandan! You never felt happy in this crowd; He always used to sit alone and meditate. Day or night, you never greeted anyone else. 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)