श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 74: भीमसेनका शान्तिविषयक प्रस्ताव  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  5.74.7 
स मन्युवशमापन्न: स्वभावं दुष्टमास्थित:।
स्वभावात् पापमभ्येति तृणैश्छन्न इवोरग:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
क्रोध के वशीभूत होकर उसने दुष्ट स्वभाव का आश्रय ले लिया है। भूसे में छिपे हुए साँप की तरह वह स्वभावतः ही दूसरों को हानि पहुँचाता है ॥7॥
 
Under the influence of anger, he has taken refuge in a wicked nature. Like a snake hiding in straw, he naturally harms others. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)