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श्लोक 5.73.42  |
दुर्योधनो न ह्यलमद्य दातुं
जीवंस्तवैतन्नृपते कथंचित्।
यत् ते पुरस्तादभवत् समृद्धं
द्यूते हृतं पाण्डवमुख्य राज्यम्॥ ४२॥ |
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| अनुवाद |
| हे पाण्डवश्रेष्ठ! हे राजन! यह निश्चय रखो कि जो तुम्हारा पहले का वैभवशाली राज्य था और जिसे तुम जुए में हार गए थे, वह सम्पूर्ण राज्य अब दुर्योधन तुम्हें जीवित रहते कभी नहीं दे सकता॥ 42॥ |
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| O great Pandava! O lord of kings! Be assured of this, the prosperous kingdom which you had earlier and which you had lost in gambling, that entire kingdom can now never be given to you by Duryodhan as long as he is alive.॥ 42॥ |
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इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कृष्णवाक्ये त्रिसप्ततितमोऽध्याय:॥ ७३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्णवाक्यविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७३॥
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