श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 73: श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको युद्धके लिये प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  5.73.18-19 
दु:शासनेन पापेन तदा द्यूते प्रवर्तिते।
अनाथवत् तदा देवी द्रौपदी सुदुरात्मना॥ १८॥
आकृष्य केशे रुदती सभायां राजसंसदि।
भीष्मद्रोणप्रमुखतो गौरिति व्याहृता मुहु:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
जिस समय द्यूतक्रीड़ा चल रही थी, उस समय अत्यन्त दुष्ट और पापी दुःशासन अनाथ की भाँति रोती-बिलखती रानी द्रौपदी को केश पकड़कर घसीटता हुआ राजसभा में ले आया और भीष्म, द्रोणाचार्य आदि के सामने उसे बार-बार 'गाय' कहकर उसका उपहास करने लगा।
 
During the time when the game of gambling was going on, the extremely wicked and sinful Dushasan dragged Queen Draupadi, who was weeping and sobbing like an orphan, by holding her hair into the royal court and in front of Bhishma and Dronacharya etc. he ridiculed her by repeatedly calling her 'cow'.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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