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mahabharat 5.73.15-16: (क्या तुम उस दिन को भूल गए हो जब) दुर्योधन और उसके भाइयों ने अपने अनुचित वचनों से तुम्हें महान दुःख पहुँचाया था । वह अत्यन्त प्रसन्न होकर और अपनी झूठी प्रशंसा करते हुए अपने भाइयों से कहा करता था कि अब पाण्डवों के पास इस संसार में 'अपना' कहने को एक भी वस्तु शेष नहीं रही । केवल नाम और वंश ही शेष रह गया है, परन्तु वह भी न रहेगा ॥15-16॥   |   mahabharat अध्याय 5.73: श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको युद्धके लिये प्रोत्साहन देना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 73: श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको युद्धके लिये प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  5.73.15-16 
वाग्भिस्त्वप्रतिरूपाभिरतुदत् त्वां सहानुजम्।
श्लाघमान: प्रहृष्ट: सन् भ्रातृभि: सह भाषते॥ १५॥
एतावत् पाण्डवानां हि नास्ति किंचिदिह स्वकम्।
नामधेयं च गोत्रं च तदप्येषां न शिष्यते॥ १६॥
 
 
अनुवाद
(क्या तुम उस दिन को भूल गए हो जब) दुर्योधन और उसके भाइयों ने अपने अनुचित वचनों से तुम्हें महान दुःख पहुँचाया था । वह अत्यन्त प्रसन्न होकर और अपनी झूठी प्रशंसा करते हुए अपने भाइयों से कहा करता था कि अब पाण्डवों के पास इस संसार में 'अपना' कहने को एक भी वस्तु शेष नहीं रही । केवल नाम और वंश ही शेष रह गया है, परन्तु वह भी न रहेगा ॥15-16॥
 
(Have you forgotten that day when) Duryodhan and his brothers had caused you great pain by his inappropriate words. He used to say to his brothers, while being very happy and falsely praising himself, that now the Pandavas do not have even a single thing left in this world to call 'theirs'. Only the name and lineage are left, but even that will not remain.'॥ 15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)