श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  5.72.9-10 
यत् तद् द्वादश वर्षाणि वनेषु ह्युषिता वयम्।
छद्मना शरदं चैकां धृतराष्ट्रस्य शासनात्॥ ९॥
स्थाता न: समये तस्मिन् धृतराष्ट्र इति प्रभो।
नाहास्म समयं कृष्ण तद्धि नो ब्राह्मणा विदु:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! हमें विश्वास था कि धृतराष्ट्र अपनी प्रतिज्ञा पर अटल रहेंगे, अतः उनकी आज्ञा से हम बारह वर्ष तक वन में रहे और एक वर्ष अज्ञातवास किया। श्री कृष्ण! हमने अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ी है; यह बात हमारे साथ रहने वाले सभी ब्राह्मण जानते हैं॥9-10॥
 
O Lord! We believed that Dhritarashtra will remain steadfast on his promise, so by his order we stayed in the forest for twelve years and lived incognito for one year. Shri Krishna! We have not broken our promise; all the Brahmins living with us know this.॥ 9-10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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