श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  5.72.86 
न चापि मम पर्याप्ता: सहिता: सर्वपार्थिवा:।
क्रुद्धस्य संयुगे स्थातुं सिंहस्येवेतरे मृगा:॥ ८६॥
 
 
अनुवाद
(मेरे अपमान से आप चिंतित न हों, क्योंकि) जैसे क्रोधित सिंह के सामने अन्य पशु खड़े नहीं हो सकते, वैसे ही यदि मैं क्रोधित हो जाऊँ, तो संसार के समस्त राजा मिलकर भी युद्ध में मेरे सामने खड़े नहीं हो सकते ॥86॥
 
(Do not be worried about my insult, because) just as other animals cannot stand before an enraged lion, similarly if I become angry, then even all the kings of the world together cannot stand before me in battle. ॥ 86॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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