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mahabharat 5.72.85: भगवान् बोले - महाराज ! मैं जानता हूँ कि धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन कितना पापी है । फिर भी यदि हम लोग वहाँ जाकर संधि का प्रयत्न करें, तो समस्त संसार के राजाओं की दृष्टि में हम सबकी निन्दा नहीं होगी ॥ 85॥   |   mahabharat अध्याय 5.72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  5.72.85 
श्रीभगवानुवाच
जानाम्येतां महाराज धार्तराष्ट्रस्य पापताम्।
अवाच्यास्तु भविष्याम: सर्वलोके महीक्षिताम्॥ ८५॥
 
 
अनुवाद
भगवान् बोले - महाराज ! मैं जानता हूँ कि धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन कितना पापी है । फिर भी यदि हम लोग वहाँ जाकर संधि का प्रयत्न करें, तो समस्त संसार के राजाओं की दृष्टि में हम सबकी निन्दा नहीं होगी ॥ 85॥
 
The Supreme Lord said - Maharaj! I know how sinful Duryodhana, son of Dhritarashtra is. However, if we go there and make efforts for a peace treaty, we all will not be condemned in the eyes of the kings of the entire world. ॥ 85॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)