श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  5.72.81 
मोचयेयं मृत्युपाशात् संरब्धान् कुरुसृंजयान्।
पाण्डवान् धार्तराष्ट्रांश्च सर्वां च पृथिवीमिमाम्॥ ८१॥
 
 
अनुवाद
ऐसा होने पर मानो मैं इन कौरवों, सृंजयों, पाण्डवों और धृतराष्ट्र के पुत्रों को, जो परस्पर क्रोध से भरे हुए हैं, तथा इस सम्पूर्ण पृथ्वी को भी मृत्यु के जाल से छुड़ा लूँगा। ॥81॥
 
When this happens, it will be as if I will rescue these Kauravas, Srinjayas, Pandavas, and the sons of Dhritarashtra, who are filled with anger against one another, as well as this entire earth, from the trap of death.' ॥ 81॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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