श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  5.72.8 
अप्रदानेन राज्यस्य शान्तिमस्मासु मार्गति।
लुब्ध: पापेन मनसा चरन्नसममात्मन:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
राजा धृतराष्ट्र राज्य के प्रति अत्यन्त लोभी हैं। उनके मन में पाप व्याप्त हो गया है। अतः वे उचित व्यवहार करने के स्थान पर, राज्य दिए बिना ही हमसे संधि करने का प्रयत्न कर रहे हैं। ॥8॥
 
King Dhritarashtra is very greedy for the kingdom. Sin has taken over his mind. Therefore, instead of behaving in a proper manner, he is trying to enter into a peace treaty with us without giving away the kingdom. ॥ 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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