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mahabharat 5.72.68: इसलिए हम न तो अपना राज्य त्यागना चाहते हैं और न ही अपने कुल का नाश चाहते हैं। यदि विनम्रता से शांति प्राप्त हो सके, तो वही सर्वोत्तम है।   |   mahabharat अध्याय 5.72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  5.72.68 
न च त्यक्तुं तदिच्छामो न चेच्छाम: कुलक्षयम्।
अत्र या प्रणिपातेन शान्ति: सैव गरीयसी॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
इसलिए हम न तो अपना राज्य त्यागना चाहते हैं और न ही अपने कुल का नाश चाहते हैं। यदि विनम्रता से शांति प्राप्त हो सके, तो वही सर्वोत्तम है।
 
Therefore, we neither wish to renounce our kingdom nor do we wish for the destruction of our family. If peace can be achieved by showing humility, then that is the best.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)