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mahabharat 5.72.67: राज्य का त्याग करने से जो शांति मिलती है, वह भी मृत्यु के समान है, क्योंकि उस स्थिति में शत्रु सदैव सशंकित रहते हैं कि अवसर पाकर आक्रमण करेंगे और धन-सम्पत्ति से वंचित होने से विनाश की संभावना सदैव बनी रहती है ॥67॥   |   mahabharat अध्याय 5.72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  5.72.67 
या तु त्यागेन शान्ति: स्यात् तदृते वध एव स:।
संशयाच्च समुच्छेदाद् द्विषतामात्मनस्तथा॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
राज्य का त्याग करने से जो शांति मिलती है, वह भी मृत्यु के समान है, क्योंकि उस स्थिति में शत्रु सदैव सशंकित रहते हैं कि अवसर पाकर आक्रमण करेंगे और धन-सम्पत्ति से वंचित होने से विनाश की संभावना सदैव बनी रहती है ॥67॥
 
The peace that is obtained by abandoning the kingdom is also equivalent to death. Because in that condition, the enemies always remain suspicious that they will attack when they find an opportunity and there is always a possibility of one's destruction due to being deprived of wealth and property. ॥ 67॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)