श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 63-64h
 
 
श्लोक  5.72.63-64h 
न चापि वैरं वैरेण केशव व्युपशाम्यति॥ ६३॥
हविषाग्निर्यथा कृष्ण भूय एवाभिवर्धते।
 
 
अनुवाद
केशव! जैसे घी डालने से अग्नि बुझने के स्थान पर और अधिक जलती है, वैसे ही वैररूपी अग्नि वैर से बुझती नहीं, अपितु और अधिक बढ़ती जाती है।
 
Keshav! Just as a fire burns more instead of getting extinguished when ghee is poured on it, similarly the fire of enmity does not get extinguished by enmity; rather it keeps on increasing more and more. 63 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)