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mahabharat 5.72.60-61h: जो मनुष्य किसी के प्रति शत्रुता रखता है, वह उस मनुष्य के समान चिन्ताग्रस्त रहता है, जो सर्पों से भरे घर में रहता है और सदैव दुःख में सोता है।   |   mahabharat अध्याय 5.72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 60-61h
 
 
श्लोक  5.72.60-61h 
जातवैरश्च पुरुषो दु:खं स्वपिति नित्यदा॥ ६०॥
अनिवृत्तेन मनसा ससर्प इव वेश्मनि।
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य किसी के प्रति शत्रुता रखता है, वह उस मनुष्य के समान चिन्ताग्रस्त रहता है, जो सर्पों से भरे घर में रहता है और सदैव दुःख में सोता है।
 
A man who bears enmity towards someone is anxious like a person who lives in a house infested with snakes and always sleeps in sorrow. 60 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)