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श्री महाभारत
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पर्व 5: उद्योग पर्व
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अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप
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श्लोक 54
श्लोक
5.72.54
पराजयश्च मरणान्मन्ये नैव विशिष्यते।
यस्य स्याद् विजय: कृष्ण तस्याप्यपचयो ध्रुवम्॥ ५४॥
अनुवाद
श्री कृष्ण! मेरा मानना है कि हार मृत्यु से बढ़कर नहीं है। जीतने वाले को भी धन की भारी हानि उठानी पड़ती है॥ 54॥
Sri Krishna! I believe that defeat is not better than death. Even the one who wins has to bear a huge loss of wealth. ॥ 54॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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