श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  5.72.53 
सर्वथा वृजिनं युद्धं को घ्नन् न प्रतिहन्यते।
हतस्य च हृषीकेश समौ जयपराजयौ॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
इससे सिद्ध होता है कि युद्ध सर्वथा पाप है। ऐसा कौन मनुष्य है जो दूसरों को मारता है, और बदले में मारा नहीं जाता? हृषीकेश! युद्ध में मारे गए मनुष्य के लिए जय और पराजय समान हैं। 53।
 
This proves that war is completely sinful. Who is the man who kills others, who does not get killed in return? Hrishikesh! For one who is killed in war, victory and defeat are the same. 53.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd