श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  5.72.50 
नात्मच्छन्देन भूतानां जीवितं मरणं तथा।
नाप्यकाले सुखं प्राप्यं दु:खं वापि यदूत्तम॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
जीवों का जन्म-मरण उनकी अपनी इच्छा से नहीं होता (यही बात जय-पराजय के विषय में भी है)। हे यदुश्रेष्ठ! किसी को भी अनुचित समय पर सुख-दुःख नहीं मिलता ॥50॥
 
The life and death of living beings do not happen according to their own wishes (the same is the case with victory and defeat). O best of the Yadu! No one gets happiness or sorrow at the wrong time. ॥ 50॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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