श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  5.72.46 
पाप: क्षत्रियधर्मोऽयं वयं च क्षत्रबन्धव:।
स न: स्वधर्मोऽधर्मो वा वृत्तिरन्या विगर्हिता॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
क्षत्रियों का यह धर्म (युद्ध) पापमय है। हम भी क्षत्रिय हैं, अतः यह हमारा स्वधर्म और पाप होने पर भी हमें इसका पालन करना चाहिए, क्योंकि इसे त्यागकर अन्य कोई धर्म अपनाना निन्दनीय होगा ॥ 46॥
 
This religion of the Kshatriyas (of war) is sinful. We too are Kshatriyas, so even though this is our swadharma and sin, we have to perform it, because abandoning it and adopting any other profession would be condemnable. ॥ 46॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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