श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  5.72.44 
ये पुन: स्युरसम्बद्धा अनार्या: कृष्ण शत्रव:।
तेषामप्यवध: कार्य: किं पुनर्ये स्युरीदृशा:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण! जो आपसे कोई सम्बन्ध नहीं रखते, जो अत्यन्त नीच और शत्रुभाव रखते हैं, उन्हें मारना उचित नहीं है। फिर जो आपके सम्बन्धी, कुलीन और हितैषी हैं, उन्हें मारना कैसे उचित हो सकता है?॥ 44॥
 
Sri Krishna! It is not proper to kill those who do not have any relation with you and who are completely mean and have enemy feelings. Then how can it be proper to kill those who are your relatives, noble and well-wishers?॥ 44॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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