श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  5.72.41 
ते वयं न श्रियं हातुमलं न्यायेन केनचित्।
अत्र नो यतमानानां वधश्चेदपि साधु तत्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
अतः हम किसी भी प्रकार अपनी पैतृक सम्पत्ति का त्याग नहीं कर सकते। यदि ऐसा करते समय हमारी मृत्यु भी हो जाए, तो भी अच्छा है ॥ 41॥
 
Therefore, by no means are we capable of abandoning our ancestral property. Even if we are killed while trying to do so, that is good. ॥ 41॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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