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mahabharat 5.72.4: हे शत्रुओं का नाश करने वाले! जैसे आप वृष्णियों की सब प्रकार के संकटों से रक्षा करते हैं, वैसे ही आप पाण्डवों की भी रक्षा करें। हे प्रभु! इस महान भय से हमारी रक्षा कीजिए।॥4॥   |   mahabharat अध्याय 5.72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.72.4 
यथा हि सर्वास्वापत्सु पासि वृष्णीनरिंदम।
तथा ते पाण्डवा रक्ष्या: पाह्यस्मान् महतो भयात्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रुओं का नाश करने वाले! जैसे आप वृष्णियों की सब प्रकार के संकटों से रक्षा करते हैं, वैसे ही आप पाण्डवों की भी रक्षा करें। हे प्रभु! इस महान भय से हमारी रक्षा कीजिए।॥4॥
 
‘O destroyer of enemies! Just as you protect the Vrishnis from all kinds of dangers, you should also protect the Pandavas in the same way. Lord! Please protect us from this great fear.’॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)