श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  5.72.37 
धर्मनित्य: प्रशान्तात्मा कार्ययोगवह: सदा।
नाधर्मे कुरुते बुद्धिं न च पापे प्रवर्तते॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य सदैव धर्म में लगा रहता है, उसका मन शान्त रहता है और वह सदैव शुभ कर्मों में लगा रहता है। वह न तो कभी अधर्म में लिप्त होता है और न पाप में लिप्त होता है। 37॥
 
A person who is always engaged in religion has a peaceful mind and is constantly engaged in good deeds. He never indulges in unrighteousness nor does he indulge in sin. 37॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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