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mahabharat 5.72.34: श्री कृष्ण! यदि उसे पुनः अपने कर्तव्य का बोध न हो, तो वह नरक की ओर ही अग्रसर होता रहता है। बुद्धि ही है जो मनुष्य को उसके कर्तव्य का बोध कराती है। जिसके पास ज्ञानरूपी नेत्र है, वह संकट पर अवश्य विजय प्राप्त कर लेता है। 34.   |   mahabharat अध्याय 5.72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.72.34 
न चेत् प्रबुध्यते कृष्ण नरकायैव गच्छति।
तस्य प्रबोध: प्रज्ञैव प्रज्ञाचक्षुस्तरिष्यति॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण! यदि उसे पुनः अपने कर्तव्य का बोध न हो, तो वह नरक की ओर ही अग्रसर होता रहता है। बुद्धि ही है जो मनुष्य को उसके कर्तव्य का बोध कराती है। जिसके पास ज्ञानरूपी नेत्र है, वह संकट पर अवश्य विजय प्राप्त कर लेता है। 34.
 
Sri Krishna! If he does not realize his duty again, then he keeps moving towards hell. It is wisdom that makes one realize his duty. One who has the eye of wisdom will definitely overcome the crisis. 34.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)