श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  5.72.33 
पापकर्मतया चैव संकरं तेन पुष्यति।
संकरो नरकायैव सा काष्ठा पापकर्मणाम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार पापकर्मों में प्रवृत्त होकर वह वर्णसंकर संतानों का पालक बनता है और वर्णसंकर संतानें नरक में ही ले जाती हैं। पापियों की यही अंतिम गति है ॥33॥
 
Thus, by being inclined towards sinful activities, he becomes the fosterer of mixed-race children, and mixed-race children only lead to hell. This is the final destination of sinners. ॥ 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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