श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  5.72.32 
तं तदा मन्युरेवैति स भूय: सम्प्रमुह्यति।
स मोहवशमापन्न: क्रूरं कर्म निषेवते॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
दरिद्र अवस्था में मनुष्य को केवल क्रोध ही क्रोध आता है, जिससे वह पुनः मोह में लीन हो जाता है और अपनी विवेक शक्ति खो देता है। मोह के वश होकर वह क्रूर कर्म करने लगता है॥ 32॥
 
In a poor state, man only gets angry, due to which he again becomes engrossed in delusion and loses his power of discrimination. Under the influence of delusion, he starts committing cruel acts.॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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