श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  5.72.31 
न चास्य सर्वशास्त्राणि प्रभवन्ति निबर्हणे।
सोऽभिक्रुध्यति भृत्यानां सुहृदश्चाभ्यसूयति॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
उस समय समस्त शास्त्र भी उसके संकट को दूर करने में समर्थ नहीं होते। वह अपने सेवकों पर क्रोध करता है और अपने सम्बन्धियों में दोष ढूँढ़ने लगता है ॥31॥
 
At that time even all the scriptures are not capable of averting his trouble. He becomes angry at his servants and starts finding faults in his relatives. ॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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