श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  5.72.30 
स तदाऽऽत्मापराधेन सम्प्राप्तो व्यसनं महत्।
सेन्द्रान् गर्हयते देवान् नात्मानं च कथञ्चन॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि उस समय मनुष्य अपनी ही भूल के कारण महान संकट में पड़ जाता है, तथापि वह इसके लिए इन्द्र आदि देवताओं को ही दोषी ठहराता है, अपने को किसी प्रकार दोषी नहीं ठहराता ॥30॥
 
Although at that time the person gets into great trouble due to his own mistake, yet he blames only the gods like Indra for this; he does not blame himself in any way. ॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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