श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  5.72.29 
न तथा बाध्यते कृष्ण प्रकृत्या निर्धनो जन:।
यथा भद्रां श्रियं प्राप्य तया हीन: सुखैधित:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण! जन्म से ही दरिद्र रहने वाले व्यक्ति को अपनी दरिद्रता के कारण उतना दुःख नहीं होता, जितना उस व्यक्ति को होता है, जिसने शुभ धन अर्जित किया हो और सुख-सुविधाओं में पला हो, जब वह उस धन से वंचित हो जाता है ॥ 29॥
 
Sri Krishna! A person who has been poor from birth does not suffer as much due to his poverty as a person who has acquired auspicious wealth and has grown up in comfort feels when he is deprived of that wealth. ॥ 29॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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