श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  5.72.27 
आपदेवास्य मरणात् पुरुषस्य गरीयसी।
श्रियो विनाशस्तद्धॺस्य निमित्तं धर्मकामयो:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
धन का नाश मनुष्य के लिए महान् विपत्ति है। यह मृत्यु से भी अधिक भयानक है, क्योंकि धन ही मनुष्य के धर्म और कर्म की सिद्धि का कारण है।
 
The loss of wealth is a great calamity for man. It is worse than death, because wealth is the reason for the accomplishment of man's religion and work. 27.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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