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mahabharat 5.72.24: जो लोग अपने बल के मद में चूर होकर किसी को धन से वंचित करते हैं, वे न केवल उसके धर्म, अर्थ और काम का नाश करते हैं, अपितु उस व्यक्ति का भी नाश करते हैं।   |   mahabharat अध्याय 5.72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  5.72.24 
ये धनादपकर्षन्ति नरं स्वबलमास्थिता:।
ते धर्ममर्थं कामं च प्रमथ्नन्ति नरं च तम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
जो लोग अपने बल के मद में चूर होकर किसी को धन से वंचित करते हैं, वे न केवल उसके धर्म, अर्थ और काम का नाश करते हैं, अपितु उस व्यक्ति का भी नाश करते हैं।
 
Those who, being confident of their own power, deprive a person of wealth, not only destroy his Dharma, Artha and Kama (desire), but they destroy that person also. 24.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)