श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  5.72.21 
एतच्च मरणं तात यन्मत्त: पतितादिव।
ज्ञातयो विनिवर्तन्ते प्रेतसत्त्वादिवासव:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
पिता जी ! जैसे लोग पतित मनुष्य से दूर भागते हैं और जैसे मृत शरीर से आत्मा निकल जाती है, वैसे ही मेरे परिवार के लोग मुझसे विमुख हो रहे हैं और यही मेरी मृत्यु है ॥21॥
 
Father! Just as people run away from a fallen man and just as the soul leaves a dead body, in the same way my family members are turning their backs on me, and this is death for me. ॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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