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mahabharat 5.72.20: श्री कृष्ण! दरिद्र मनुष्य से उसके भाई, मित्र और ब्राह्मण भी उसी प्रकार विमुख हो जाते हैं, जैसे फूल और फल से रहित वृक्ष से पक्षी उड़ जाते हैं।   |   mahabharat अध्याय 5.72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  5.72.20 
अधनाद्धि निवर्तन्ते ज्ञातय: सुहृदो द्विजा:।
अपुष्पादफलाद् वृक्षाद् यथा कृष्ण पतत्त्रिण:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण! दरिद्र मनुष्य से उसके भाई, मित्र और ब्राह्मण भी उसी प्रकार विमुख हो जाते हैं, जैसे फूल और फल से रहित वृक्ष से पक्षी उड़ जाते हैं।
 
Sri Krishna! Even his brothers, friends and Brahmins turn away from a poor man just like birds fly away from a tree devoid of flowers and fruits.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)