श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.72.17 
न च तानपि दुष्टात्मा धार्तराष्ट्रोऽनुमन्यते।
स्वाम्यमात्मनि मत्वासावतो दु:खतरं नु किम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
परन्तु दुष्टात्मा दुर्योधन सब कुछ अपना मानकर उन पाँच गाँवों को भी देने को तैयार नहीं है। इससे बढ़कर दुःख की बात और क्या हो सकती है?॥17॥
 
But the evil-spirited Duryodhan is not agreeing to give even those five villages, considering everything as his own. What can be more painful than this?॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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