न च तानपि दुष्टात्मा धार्तराष्ट्रोऽनुमन्यते।
स्वाम्यमात्मनि मत्वासावतो दु:खतरं नु किम्॥ १७॥
अनुवाद
परन्तु दुष्टात्मा दुर्योधन सब कुछ अपना मानकर उन पाँच गाँवों को भी देने को तैयार नहीं है। इससे बढ़कर दुःख की बात और क्या हो सकती है?॥17॥
But the evil-spirited Duryodhan is not agreeing to give even those five villages, considering everything as his own. What can be more painful than this?॥ 17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥