श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 72: युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे अपना अभिप्राय निवेदन करना, श्रीकृष्णका शान्तिदूत बनकर कौरवसभामें जानेके लिये उद्यत होना और इस विषयमें उन दोनोंका वार्तालाप  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  5.72.13 
इतो दु:खतरं किं नु यदहं मातरं तत:।
संविधातुं न शक्नोमि मित्राणां वा जनार्दन॥ १३॥
 
 
अनुवाद
हे जनार्दन! इससे अधिक दुःख की बात और क्या हो सकती है कि मैं अपनी माता और मित्रों का भी भरण-पोषण ठीक से नहीं कर पाता?
 
O Janardan! What can be more saddening than the fact that I am not even able to provide for my mother and friends properly? 13.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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