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श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 7: श्रीकृष्णका दुर्योधन तथा अर्जुन दोनोंको सहायता देना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  5.7.31 
वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्तस्तु तदा परिष्वज्य हलायुधम्।
कृष्णं चापहृतं ज्ञात्वा युद्धान्मेने जितं जयम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! बलभद्र की यह बात सुनकर दुर्योधन ने उन्हें गले लगा लिया और श्रीकृष्ण के साथ छल हुआ जानकर युद्ध की विजय निश्चित मान ली।
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! On hearing Balabhadra say this, Duryodhan embraced him and knowing that Shri Krishna had been deceived, he considered the victory of the war as certain.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)