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mahabharat 5.68.14: महायोगी श्रीहरि सम्पूर्ण जगत के स्वामी और ईश्वर होते हुए भी, जैसे किसान अपनी कृषि का विस्तार करता है, वैसे ही वे सदैव नए-नए कर्मों का प्रारंभ करते हैं। 14॥   |   mahabharat अध्याय 5.68: संजयका धृतराष्ट्रको भगवान‍् श्रीकृष्णकी महिमा बतलाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 68: संजयका धृतराष्ट्रको भगवान‍् श्रीकृष्णकी महिमा बतलाना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.68.14 
ईशन्नपि महायोगी सर्वस्य जगतो हरि:।
कर्माण्यारभते कर्तुं कीनाश इव वर्धन:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
महायोगी श्रीहरि सम्पूर्ण जगत के स्वामी और ईश्वर होते हुए भी, जैसे किसान अपनी कृषि का विस्तार करता है, वैसे ही वे सदैव नए-नए कर्मों का प्रारंभ करते हैं। 14॥
 
Mahayogi Shri Hari, despite being the Lord and God of the entire world, always starts new deeds like a farmer who expands his agriculture. 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)