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श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 64: विदुरका कौटुम्बिक कलहसे हानि बताते हुए धृतराष्ट्रको संधिकी सलाह देना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.64.4 
तथा तमनुधावन्तं मृगयुं शकुनार्थिनम्।
आश्रमस्थो मुनि: कश्चिद् ददर्शाथ कृताह्निक:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
उन्हीं दिनों उस वन में एक ऋषि रहते थे। वे संध्यावंदन आदि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर अपने आश्रम में बैठे थे। उन्होंने देखा कि एक शिकारी पक्षियों को पकड़ने के लिए उनका पीछा कर रहा है।
 
In those days, a sage lived in that forest. He was sitting in his ashram after completing his daily rituals like evening prayers etc. He saw the hunter chasing the birds to catch them.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)