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श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 64: विदुरका कौटुम्बिक कलहसे हानि बताते हुए धृतराष्ट्रको संधिकी सलाह देना  »  श्लोक 19-20
 
 
श्लोक  5.64.19-20 
आशीविषै रक्ष्यमाणं कुबेरदयितं भृशम्।
यत् प्राप्य पुरुषो मर्त्योऽप्यमरत्वं नियच्छति॥ १९॥
अचक्षुर्लभते चक्षुर्वृद्धो भवति वै युवा।
इति ते कथयन्ति स्म ब्राह्मणा जम्भसाधका:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
उस शहद की रक्षा भयंकर विषैले सर्प करते थे। कुबेर को वह शहद बहुत प्रिय था। हमारे साथी औषधि-साधक ब्राह्मण कह रहे थे कि इस शहद को पाकर नश्वर मनुष्य भी अमरत्व प्राप्त कर लेता है। इसे पीने से अंधा भी दृष्टि प्राप्त कर लेता है और बूढ़ा भी जवान हो जाता है।
 
Terrible poisonous snakes used to protect that honey. Kuber was very fond of that honey. Our fellow medicine-seeking Brahmins were telling that by getting this honey, even a mortal man attains immortality. By drinking it, a blind man regains his sight and an old man also becomes young.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)