श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 63: दुर्योधनद्वारा अपने पक्षकी प्रबलताका वर्णन करना और विदुरका दमकी महिमा बताना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  5.63.24 
उत्सृज्यैव गृहान् यस्तु मोक्षमेवाभिमन्यते।
लोकास्तेजोमयास्तस्य कल्पन्ते शाश्वता दिवि॥ २४॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य गृहस्थ जीवन का त्याग करके केवल मोक्ष का आदर करता है, वह स्वर्गलोक में उज्ज्वल शाश्वत स्थान प्राप्त करता है ॥24॥
 
One who gives up his family life and respects salvation only, attains a bright eternal place in the heavenly world. 24॥
 
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि विदुरवाक्ये त्रिषष्टितमोऽध्याय:॥ ६३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें विदुरवाक्यसम्बन्धी तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६३॥

 
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas