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श्लोक 5.63.24  |
उत्सृज्यैव गृहान् यस्तु मोक्षमेवाभिमन्यते।
लोकास्तेजोमयास्तस्य कल्पन्ते शाश्वता दिवि॥ २४॥ |
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| अनुवाद |
| जो मनुष्य गृहस्थ जीवन का त्याग करके केवल मोक्ष का आदर करता है, वह स्वर्गलोक में उज्ज्वल शाश्वत स्थान प्राप्त करता है ॥24॥ |
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| One who gives up his family life and respects salvation only, attains a bright eternal place in the heavenly world. 24॥ |
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इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि विदुरवाक्ये त्रिषष्टितमोऽध्याय:॥ ६३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें विदुरवाक्यसम्बन्धी तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६३॥
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