श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 63: दुर्योधनद्वारा अपने पक्षकी प्रबलताका वर्णन करना और विदुरका दमकी महिमा बताना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  5.63.23 
शकुनीनामिवाकाशे पदं नैवोपलभ्यते।
एवं प्रज्ञानतृप्तस्य मुनेर्वर्त्म न दृश्यते॥ २३॥
 
 
अनुवाद
जैसे आकाश में पक्षियों के पदचिह्न नहीं दिखाई देते, वैसे ही ज्ञान के आनन्द से संतुष्ट मुनिका का मार्ग भी दिखाई नहीं देता अर्थात् समझ में नहीं आता ॥23॥
 
Just as the footprints of birds are not visible in the sky, similarly the path of Munika, who is satisfied with the joy of knowledge, is not visible i.e. not understood. 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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