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mahabharat 5.62.3: यद्यपि मैंने उन महर्षि के प्रति महान पाप किया था, फिर भी गुरुदेव ने मुझे शाप नहीं दिया, यह उनका मुझ पर महान उपकार है। अन्यथा वे परम तेजस्वी महामुनि समुद्र सहित सम्पूर्ण पृथ्वी को जला सकते हैं॥3॥   |   mahabharat अध्याय 5.62: कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसपर आक्षेप, कर्णका सभा त्यागकर जाना और भीष्मका उसके प्रति पुन: आक्षेपयुक्त वचन कहना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 62: कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसपर आक्षेप, कर्णका सभा त्यागकर जाना और भीष्मका उसके प्रति पुन: आक्षेपयुक्त वचन कहना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.62.3 
महापराधे ह्यपि यन्न तेन
महर्षिणाहं गुरुणा च शप्त:।
शक्त: प्रदग्धुं ह्यपि तिग्मतेजा:
ससागरामप्यवनिं महर्षि:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि मैंने उन महर्षि के प्रति महान पाप किया था, फिर भी गुरुदेव ने मुझे शाप नहीं दिया, यह उनका मुझ पर महान उपकार है। अन्यथा वे परम तेजस्वी महामुनि समुद्र सहित सम्पूर्ण पृथ्वी को जला सकते हैं॥3॥
 
Although I had committed a great sin against that great sage, yet the Gurudev did not curse me, this is his great favour on me. Otherwise that extremely illustrious Mahamuni can burn the entire earth including the ocean.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)