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mahabharat 5.62.15: कैसा सत्यनिष्ठ सारथीपुत्र कर्ण (जिसने पहले पाण्डवों को परास्त करने की प्रतिज्ञा की थी, किन्तु अब युद्ध से विमुख होकर भाग गया), इतना बड़ा उत्तरदायित्व कैसे उठा सका? अब तुम सब लोग अपनी-अपनी सेना बनाकर पाण्डव सेना का सामना करो और युद्ध करो और भीमसेन के हाथों एक-दूसरे के सिर काटकर सम्पूर्ण जगत का विनाश देखो॥ 15॥   |   mahabharat अध्याय 5.62: कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसपर आक्षेप, कर्णका सभा त्यागकर जाना और भीष्मका उसके प्रति पुन: आक्षेपयुक्त वचन कहना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 62: कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसपर आक्षेप, कर्णका सभा त्यागकर जाना और भीष्मका उसके प्रति पुन: आक्षेपयुक्त वचन कहना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  5.62.15 
सत्यप्रतिज्ञ: किल सूतपुत्र-
स्तथा स भारं विषहेत कस्मात्।
व्यूहं प्रतिव्यूह्य शिरांसि भित्त्वा
लोकक्षयं पश्यत भीमसेनात्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
कैसा सत्यनिष्ठ सारथीपुत्र कर्ण (जिसने पहले पाण्डवों को परास्त करने की प्रतिज्ञा की थी, किन्तु अब युद्ध से विमुख होकर भाग गया), इतना बड़ा उत्तरदायित्व कैसे उठा सका? अब तुम सब लोग अपनी-अपनी सेना बनाकर पाण्डव सेना का सामना करो और युद्ध करो और भीमसेन के हाथों एक-दूसरे के सिर काटकर सम्पूर्ण जगत का विनाश देखो॥ 15॥
 
What a man of truth was Karna, the son of a charioteer (who had earlier pledged to defeat the Pandavas, but now turned his back on the battle and fled), how could he have shouldered such a great responsibility? Now you all should form a formation of your own army to face the formation of the Pandava army and fight and see the destruction of the entire world at the hands of Bhimasena by cutting off each other's heads.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)