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mahabharat 5.62.1: वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! विचित्रवीर्यनन्दन धृतराष्ट्र को पहले की तरह बार-बार कुन्तीकुमार अर्जुन के विषय में प्रश्न पूछते देख कर्ण ने उसकी परवाह न करते हुए कौरव सभा में दुर्योधन को प्रसन्न करते हुए कहा-॥ 1॥   |   mahabharat अध्याय 5.62: कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसपर आक्षेप, कर्णका सभा त्यागकर जाना और भीष्मका उसके प्रति पुन: आक्षेपयुक्त वचन कहना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 62: कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसपर आक्षेप, कर्णका सभा त्यागकर जाना और भीष्मका उसके प्रति पुन: आक्षेपयुक्त वचन कहना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  5.62.1 
वैशम्पायन उवाच
तथा तु पृच्छन्तमतीव पार्थं
वैचित्रवीर्यं तमचिन्तयित्वा।
उवाच कर्णो धृतराष्ट्रपुत्रं
प्रहर्षयन् संसदि कौरवाणाम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! विचित्रवीर्यनन्दन धृतराष्ट्र को पहले की तरह बार-बार कुन्तीकुमार अर्जुन के विषय में प्रश्न पूछते देख कर्ण ने उसकी परवाह न करते हुए कौरव सभा में दुर्योधन को प्रसन्न करते हुए कहा-॥ 1॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Vichitraviryanandan Seeing Dhritarashtra repeatedly asking questions about Kuntikumar Arjun like before, Karna, not caring about him, said while making Duryodhana happy in the Kaurava assembly, -॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)