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mahabharat 5.61.29: हे शत्रुओं का नाश करने वाले जनमेजय! दुर्योधन के ऐसा कहने पर भरतपुत्र धृतराष्ट्र युद्ध की इच्छा रखने वाले दुर्योधन का अभिप्राय समझ गये और उन्होंने पुनः संजय से उचित प्रश्न पूछा।   |   mahabharat अध्याय 5.61: दुर्योधनद्वारा आत्मप्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 61: दुर्योधनद्वारा आत्मप्रशंसा  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  5.61.29 
इत्युक्ते संजयं भूय: पर्यपृच्छत भारत:।
ज्ञात्वा युयुत्सो: कार्याणि प्राप्तकालमरिंदम॥ २९॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रुओं का नाश करने वाले जनमेजय! दुर्योधन के ऐसा कहने पर भरतपुत्र धृतराष्ट्र युद्ध की इच्छा रखने वाले दुर्योधन का अभिप्राय समझ गये और उन्होंने पुनः संजय से उचित प्रश्न पूछा।
 
O Janamejaya, the destroyer of enemies! When Duryodhana said this, Dhritarashtra, the son of Bharata, understood the intention of Duryodhana who desired war and again asked Sanjaya the appropriate question.
 
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि दुर्योधनवाक्ये एकषष्टितमोऽध्याय:॥ ६१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें दुर्योधनवाक्यविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६१॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)