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mahabharat 5.61.18: जिनसे मैं द्वेष रखता हूँ, उनकी रक्षा करने का साहस अश्विनीकुमार, वायु, अग्नि, मरुद्गण तथा इन्द्र और धर्म भी नहीं कर सकते॥18॥   |   mahabharat अध्याय 5.61: दुर्योधनद्वारा आत्मप्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 61: दुर्योधनद्वारा आत्मप्रशंसा  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  5.61.18 
अश्विनावथ वाय्वग्नी मरुद्भि: सह वृत्रहा।
धर्मश्चैव मया द्विष्टान् नोत्सहन्तेऽभिरक्षितुम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जिनसे मैं द्वेष रखता हूँ, उनकी रक्षा करने का साहस अश्विनीकुमार, वायु, अग्नि, मरुद्गण तथा इन्द्र और धर्म भी नहीं कर सकते॥18॥
 
Even Ashwini Kumar, Vayu, Agni, Marudgana along with Indra and Dharma do not have the courage to protect those against whom I have hatred. 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)